Saturday, 1 June 2013

क्यूं सोती रहती कागज़ पर

क्यूं सोती रहती कागज़ पर 
मेरी कलम क्यों लिखती ही नहीं 
दुनिया जलती दावानल में 
मेरी चिंगारी दिखती ही नहीं 

क्यूँ मैंने लिखना छोड़ दिया 
क्यूँ अपने रुख को मोड़ दिया 
खुद से खुद ने जब खुद पूछा  
खुद को पाया कुछ और ही दूजा 

दुनिया की भागादौड़ी में 
दाम दीनार पैसा कौड़ी में
एक अजीब सी बात हुयी 
एक बिना जनाज़े मौत हुयी 

कुछ टूट गया तिनका तिनका 
कुछ राख हुआ कतरा कतरा 
जब हुआ रूबरू साये से 
तो साया था बिखरा बिखरा 

अब नब्ज शांत और धीमी है 
और सांसे भी कुछ भीनी है 
अन्दर सब ठहरा ठहरा है 
और आँखों पर एक पहरा है 
  
अब देख नहीं पाता और के दर्द और कठिनाई को 
कुछ दीमक जैसा चाट गया मेरे अन्दर की तरुनाई को 
बहार सब आपाधापी है अन्दर है सब सुनसान पड़ा 
मैं हाड़ मांस का पुतला सा जैसे का  तैसा ही खड़ा 

क्या टोटा ये स्याही का है 
या शब्दों का आकाल पड़ा 
चमक चली कलम से गयी 
और कागज है बेहाल पड़ा 

कुछ नीरस से विज्ञान से आगे सोच मेरी चलती ही नहीं 
सो सोती रहती कागज पर मेरी कलम लिखती ही नही  


Tuesday, 28 May 2013

ये मेरा जीवन है

ये मेरा जीवन है
जिसको मैंने जिया है
अनुभव रस का एक प्याला
जिसको मैंने पिया है

उठाना, चलना , गिर जाना
और गिरकर फिर उठ जाना
बचपन ने ही सिखा दिया था
जीवन मंच का ताना बाना
गिरने को ठहराव मानना
न उठने को बहकाव
सरल तरंगगति में बह जाना
विपरीत गति मिलते टकराव
इसी सोच को सोचा मैंने
इसी पर आधारित कर्म किया है
ये मेरा जीवन है… 

फिर समाज में प्रवेश लिया
जीवन ने सबसे मिलवाया
दुःख देखे और दुखी हुआ
सुख पाकर मन मुस्काया
ये दोनों पूरक है परस्पर
किसी एक का अस्तित्व नहीं
सुख के बिना दुःख है अधूरा
बिना दुःख के सुख का महत्त्व  नहीं
गूंड रहस्य जीवन का है ये
इसको मैंने पहचान लिया है
ये मेरा जीवन है… 

शत्रु मित्र की परिभाषा भी
मैंने जीवन से सीखी है
अनुभव से जाना मानव चित्त
वस्तु (जीवन )ये गुरुग्रंथ सरीखी है
हम श्रेष्ठतम रचना उस
रचनाकार विधाता की
रंग रूप अनेक सही पर
परिभाषा हम एकता की
ज्ञान इस जटिल व्यवस्था का
इसी जीवन से मैंने लिया है
ये मेरा जीवन है जिसको मैंने जिया है 



एक और बार

एक और बार 
वो सिंह की दहाड़ 
वो सर्प की फुंकार 
वो कृष्ण का गीता सार 
वो राम का दानव संहार 
रक्त छल्छलित धरती करती हाहाकार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

वेदना माँ की आँखों की 
शिशुओं का करुण  क्रंदन 
मस्तक ओजित लाल रंग 
कर जोड़ कर रहा वंदन 
दो दंड अब होकर प्रचंड 
तुम शिव तांडव का हो प्रहार 
तेरी जननी का तेरे समक्ष नितदिन हो रहा बलात्कार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

हम कोटि इकाई वो मुट्ठी भर 
फिर भी  जाते हम डर 
कहा गया वो शोर्य तुम्हारा 
माँ के दूध में रही कहाँ कसर 
रच महाभारत की नयी गाथा 
बन कृष्ण क्रांति का सूत्रधार 
प्रति पल चीर हरण की दुखिता 
तेरी माँ फिर करे पुकार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

वो अधर्म का नग्न नृत्य 
तू पवित्र और धर्मोचित कृत्य
वो वहशीपन का साक्षात् रूप 
तू सत्य शिव सुन्दर स्वरुप 
तोड़ धैर्य के इस बाँध को और हो जाने दे आर पार 
यज्ञाहुतियों का भागी बन प्राणदान का कर सत्कार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

क्यूँ  बाँध रखा मन को अपने 
प्रतिकार से क्यों हिचकता है 
आला उधल का वंशज तू
 क्यों आँखे भींचे सिसकता है 
तू वही रक्त वही ताप है तुझमें 
तू कर सकता है चमत्कार 
हर हर महादेव के स्वर में मिल जाने दे ओंकार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

एक और बार ले अंगड़ाई 
तू तरुणाई की चौखट पर 
बन महाकाल विध्वंश मचा 
इस घोर कलि की आहाट पर 
तू भीष्म पितामह का गौरव 
गांडीव प्रत्यंचा की टंकार 
भुला फल तू कर्म कर अपना ले गीता सार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार