Saturday, 1 June 2013

क्यूं सोती रहती कागज़ पर

क्यूं सोती रहती कागज़ पर 
मेरी कलम क्यों लिखती ही नहीं 
दुनिया जलती दावानल में 
मेरी चिंगारी दिखती ही नहीं 

क्यूँ मैंने लिखना छोड़ दिया 
क्यूँ अपने रुख को मोड़ दिया 
खुद से खुद ने जब खुद पूछा  
खुद को पाया कुछ और ही दूजा 

दुनिया की भागादौड़ी में 
दाम दीनार पैसा कौड़ी में
एक अजीब सी बात हुयी 
एक बिना जनाज़े मौत हुयी 

कुछ टूट गया तिनका तिनका 
कुछ राख हुआ कतरा कतरा 
जब हुआ रूबरू साये से 
तो साया था बिखरा बिखरा 

अब नब्ज शांत और धीमी है 
और सांसे भी कुछ भीनी है 
अन्दर सब ठहरा ठहरा है 
और आँखों पर एक पहरा है 
  
अब देख नहीं पाता और के दर्द और कठिनाई को 
कुछ दीमक जैसा चाट गया मेरे अन्दर की तरुनाई को 
बहार सब आपाधापी है अन्दर है सब सुनसान पड़ा 
मैं हाड़ मांस का पुतला सा जैसे का  तैसा ही खड़ा 

क्या टोटा ये स्याही का है 
या शब्दों का आकाल पड़ा 
चमक चली कलम से गयी 
और कागज है बेहाल पड़ा 

कुछ नीरस से विज्ञान से आगे सोच मेरी चलती ही नहीं 
सो सोती रहती कागज पर मेरी कलम लिखती ही नही