क्यूं सोती रहती कागज़ पर
मेरी कलम क्यों लिखती ही नहीं
दुनिया जलती दावानल में
मेरी चिंगारी दिखती ही नहीं
क्यूँ मैंने लिखना छोड़ दिया
क्यूँ अपने रुख को मोड़ दिया
खुद से खुद ने जब खुद पूछा
खुद को पाया कुछ और ही दूजा
दुनिया की भागादौड़ी में
दाम दीनार पैसा कौड़ी में
एक अजीब सी बात हुयी
एक बिना जनाज़े मौत हुयी
कुछ टूट गया तिनका तिनका
कुछ राख हुआ कतरा कतरा
जब हुआ रूबरू साये से
तो साया था बिखरा बिखरा
अब नब्ज शांत और धीमी है
और सांसे भी कुछ भीनी है
अन्दर सब ठहरा ठहरा है
और आँखों पर एक पहरा है
अब देख नहीं पाता और के दर्द और कठिनाई को
कुछ दीमक जैसा चाट गया मेरे अन्दर की तरुनाई को
बहार सब आपाधापी है अन्दर है सब सुनसान पड़ा
मैं हाड़ मांस का पुतला सा जैसे का तैसा ही खड़ा
क्या टोटा ये स्याही का है
या शब्दों का आकाल पड़ा
चमक चली कलम से गयी
और कागज है बेहाल पड़ा
कुछ नीरस से विज्ञान से आगे सोच मेरी चलती ही नहीं
सो सोती रहती कागज पर मेरी कलम लिखती ही नही