Tuesday, 28 May 2013

एक और बार

एक और बार 
वो सिंह की दहाड़ 
वो सर्प की फुंकार 
वो कृष्ण का गीता सार 
वो राम का दानव संहार 
रक्त छल्छलित धरती करती हाहाकार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

वेदना माँ की आँखों की 
शिशुओं का करुण  क्रंदन 
मस्तक ओजित लाल रंग 
कर जोड़ कर रहा वंदन 
दो दंड अब होकर प्रचंड 
तुम शिव तांडव का हो प्रहार 
तेरी जननी का तेरे समक्ष नितदिन हो रहा बलात्कार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

हम कोटि इकाई वो मुट्ठी भर 
फिर भी  जाते हम डर 
कहा गया वो शोर्य तुम्हारा 
माँ के दूध में रही कहाँ कसर 
रच महाभारत की नयी गाथा 
बन कृष्ण क्रांति का सूत्रधार 
प्रति पल चीर हरण की दुखिता 
तेरी माँ फिर करे पुकार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

वो अधर्म का नग्न नृत्य 
तू पवित्र और धर्मोचित कृत्य
वो वहशीपन का साक्षात् रूप 
तू सत्य शिव सुन्दर स्वरुप 
तोड़ धैर्य के इस बाँध को और हो जाने दे आर पार 
यज्ञाहुतियों का भागी बन प्राणदान का कर सत्कार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

क्यूँ  बाँध रखा मन को अपने 
प्रतिकार से क्यों हिचकता है 
आला उधल का वंशज तू
 क्यों आँखे भींचे सिसकता है 
तू वही रक्त वही ताप है तुझमें 
तू कर सकता है चमत्कार 
हर हर महादेव के स्वर में मिल जाने दे ओंकार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 

एक और बार ले अंगड़ाई 
तू तरुणाई की चौखट पर 
बन महाकाल विध्वंश मचा 
इस घोर कलि की आहाट पर 
तू भीष्म पितामह का गौरव 
गांडीव प्रत्यंचा की टंकार 
भुला फल तू कर्म कर अपना ले गीता सार 
एक और बार , एक और बार,  एक और बार 










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